सीतामढ़ी ब्रेकिंग कुव्यवस्था की भेंट चढ़ गया देसी चिकित्सालय ,दो चिकित्सक के सहारे संचालित हो रहा जिले का 06 अस्पताल
कुव्यवस्था की भेंट चढ़ गया देसी चिकित्सालय ,दो चिकित्सक के सहारे संचालित हो रहा जिले का 06 अस्पताल
अधिकारियों एवं कर्मियो की कमी के कारण बंदी के कगार पर पहुँच चुका है अस्पताल। गुदरी बाजार के अस्पताल भवन हो चुका है अतिक्रमण का शिकार ,कई जगह सिर्फ कागजों में हो रहा अस्पताल का संचालन.....जिले में खोले गए देसी अस्पतालों की हालात बद से बदतर हो चुकी है। अस्पतालों में चिकित्सक एवं कर्मी नहीं है। शहर का एक अस्पताल अतिक्रमण का शिकार हो चुका है। अस्पतालों में कुव्यवस्था का आलम यह है कि यहां मरीज इलाज कराने नहीं आते हैं। जबकि इन अस्पतालों पर सरकारी राजस्व का लाखों खर्च होता है। साल दर साल अस्पताल मेंटेनेंस के लिए सामग्री दवा की खरीदारी कागजों पर अवश्य की जाती है। अस्पतालों के भवनों की हालात खराब हो चुकी है। मरीजों के लिए जरूरी सुविधाएं नदारद है। बताते दें कि जिला में यूनानी के तीन, आयुर्वेद के दो और होम्योपैथ का एक अस्पताल करीब छह दशक पूर्व सरकार द्वारा खोले गए थे। इसमें परसौनी के भुल्ली स्थित आयुर्वेद, परिहार के बेतहा में यूनानी, नानपुर के पोखरैरा में यूनानी , बैरगनिया में होम्योपैथ, शहर के गुदरी बाजार स्थित आयुर्वेद एवं गौशाला चौक स्थित जिला संयुक्त अस्पताल शामिल है। शुरुआत के दिनों में लोगों को थोड़ा लाभ मिला और इसके बाद व्यवस्था ने ही व्यवस्था को निगल लिया।
गुदरी बाजार का आयुर्वेद अस्पताल अतिक्रमण का शिकार.. .
शहर का गुदरी बाजार में 1961 में स्थापित आयुर्वेद अस्पताल सिर्फ नाम का अस्पताल बनकर रह गया है। यहां वर्तमान में एक चिकित्सक डॉ सुरेंद्र शर्मा प्रभार में हैं। एक मिश्रक एवं एक चपरासी पदस्थापित है। अधिकारियों की लापरवाही के वजह से अस्पताल के चारों ओर से लोगों ने अतिक्रमण कर लिया है। इसके कारण बाहर से देखने पर पता नहीं चल पाता है कि यहां कोई सरकारी संस्थान चल रहा है। स्थानीय लोगों की मानें तो अस्पताल में चिकित्सक एवं कर्मी कभी-कभार देखने को मिलते हैं। मरीजों को अस्पताल में कोई सुविधा नहीं मिलता है।रकार का होता लाखों खर्च पर मरीज को नहीं मिलता है लाभ..... सरकार इन अस्पतालों पर प्रतिवर्ष लाखों रुपए व्यय करती है, परंतु आम मरीजों को इन अस्पतालों से कोई लाभ नहीं मिलता है। जिला कार्यालय से सरकार का प्रतिवर्ष मरीजों के मद में लाखों रुपया व्यय होता है साथ ही मेंटेनेंस खर्च भी लाखों में होता है लेकिन इसके बदले मरीजों को सुविधा मुहैया नहीं हो पा रही है।
बैरगनिया में चपरासी खोलता है अस्पताल....
बैरगनिया में स्थापित होम्योपैथ अस्पताल बदहाली का शिकार हो चुका है। आलम यह है कि यहां के भवन जर्जर तो है ही साथ ही अन्य संसाधनों का भी अभाव है। यहां चपरासी के बदौलत सप्ताह में कभी-कभार अस्पताल खुलता है। कागज में लाखों रुपये की दवा की खरीददारी होती है लेकिन मरीजों को दवा नहीं मिल पा रही है। वर्तमान में यहां एक मिश्रक एवं एक चपरासी प्रतिनियुक्त है। चिकित्सक के पद लगभग 6 वर्षों से अधिक से रिक्त है। वर्ष 2015 में डॉ सब्बीर अहमद के सेवानिवृत्त होने के बाद यहां चिकित्सक की प्रतिनियुक्ति नहीं हुई है। स्थानीय लोगों ने कहा कि अस्पताल सिर्फ नाम का बनकर रह गया है। इलाके के लोगों को इससे कोई लाभ नहीं मिल पाता है। लोगों ने कहा की प्रतिनियुक्त चपरासी श्री पांडेय का रवैया मरीजों के साथ सही नही हैं। लोग प्रतिदिन अस्पताल में इलाज करवाने पहुंचते है लेकिन बन्द होने के कारण दवा नही मिल पाती हैं।
अधिकारियों के संज्ञान में आने के बाद भी नहीं होती कार्रवाई....
वर्ष 2018 में भी निवर्तमान जिलाधिकारी डॉ रणजीत कुमार सिंह को इस समस्या से अवगत कराया गया था लेकिन अधिकारियो की लापरवाही से आज भी तमाम अस्पताल की स्थिति जर्जर बनी हुई है। अधिकारी बस कागजी खानापूर्ति में लगे हुए हैं। उनके कानों तक जूं नहीं रेंग रही हैं। अधिकारियों से पूछने पर बस चिकित्सक व कर्मियों की कमी की दुहाई देते हैं। लेकिन पड़ताल में देखने को मिला की जो कर्मी पदस्थापित भी है वो भी समय से अस्पताल में उपस्थित नही होते हैं। कहीं 10 बजे अस्पताल खुलता है तो कही सप्ताह में एक-दो दिन ही खुलता है महज चंद घंटों के लिए।



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